हमारे
जीवन में बोहोत सारी जिम्मेदारियाँ होती है. इसमें हम सब अलग अलग किरदार अदा करते है. जैसे की बच्चोंका, युवा का, जिम्मेदार नागरिक या फिर व्यक्ती, जैसे की माता-पिता, चाचा-चाची, नाना-नानी इत्यादी.
और इन जिम्मेदारियो मे से एक परिजनोका किरदार सबसे महत्वपूर्ण है. हम इसको बहु कार्यकारी कह सकते है.
क्यों बहु कार्यकारी?
इस उम्र में माता पिताकी जिम्मेदारियां ज्यादा होती है. अपने बच्चोके प्रति, माता-पिता के प्रति, सामाजिक और कार्यालयीन इत्यादी. हर एक जिम्मेदारी के प्रति उनका बर्ताव अलग होता है. जैसे की हम जानते है की आज कल के बच्चोको संभालना इतना आसान नहीं रहा। और बढ़ोकि अलगही आशाएं होती है अपने बेटे या बहु से। और अगर सामाजिक जिम्मेदीरीओ की बात की जाये तो वो बयां भी नहीं कर सकते।
क्या माता-पिता का किरदार ज्यादा कठीन होता है अपने दफ्तर के कामसे?
पहले
तो हमें परिस्थितिओको समझना चाहिए। दफ्तर का काम करने से पहले हम ने पाठशाला, महाविद्यालय में
और दफ्तर प्रशिक्षण दे दिया जाता है, पर अगर बात करे माता-पिता की जिम्मेदारिओकी तो इसके लिए ऐसा कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। ये तो सिर्फ हमारे पुराने खुद के अवलोकन पे और बढ़ो के मार्गदर्शन पे निरभर करता है।
क्या बुजुर्गोका मार्गदर्शन जरुरी है?
इसमें
कोई शंका या दोहराई नहीं है, क्योकि हमारे पास कोई शैक्षणिक उपलब्धता नहीं है जो की हमें बच्चो को कैसे संभालना है ये सीखा सखे। हमारे संस्कार जिन्दा रखने के लिए बुजुर्गोका मार्गदर्शन अत्यावश्यक है। इस मार्गदर्शन के वजहसे बच्चो को संभालनेके हमें बहोतो से मार्ग मिल जाते है। बहोतसे परिवार शहरोमे रहते है जो की बुज़ुर्गोंका साथ रहना पसंत नहीं करते पर वे बुज़ुर्गोंके मार्गदर्शन का महत्त्व नहीं जानते।
संस्कार।
जिम्मेदारियोंमे यह एक पहेली महत्त्व पूर्ण जिम्मेदारी है। यह सिर्फ अपने एक माता-पिता की नहीं यही बलकी सभी माता-पिताओंकी है। क्योकि सभी बच्चे एक साथ बड़े होते है और वे सब भविष्यके अच्छे समाजका हिसा है। भले हमारा बच्चा बुरा बर्ताव करे हम दुसरेके बच्चों को ही कोसते है, हम हमारे बच्चों को मार्गदर्शन नहीं करते। हम हमारे बचेको सलाह देते है की उसके साथ नहीं खेलना। कुछ माता-पिता तो अपने बच्चों के सामनेही झगड़ते है पर वे यह भूल जाते है की उनके बच्चे यह सब उनसे सिख रहे है।
शिक्षात्मक जिम्मेदारियाँ।
सभी माता-पिता अपने बच्चों के अच्छे भविष के लिए बोहोत प्रयत्न करते है। हमारे बच्चे किस दिशा में इच्छुक और अग्रेसर है और कहा वे संतुष्ट है यह जानना
जरुरी है। अपने बचे के पढाई के लिए माता-पिता शिक्षण पे कर्जा उठाते है और आशा करते है की उसने कामकाज ही करना चाइये, परंतु वे यह भूल जाते है की अपने बच्चों के इच्छायें क्या है।
सामाजिक जिम्मेदारियाँ।
ये सबसे महत्वपुर्ण जिम्मेदारी है जो की अपने बच्चोको सिखानी जरुरी है। पर माता-पिता इसमें सफल नहीं हो पाते। हम सिर्फ यही सिखाते है की कैसे अच्छी जिंदगी जीने के लिए पैसे कमाए जाये, और इसी वजहसे हमारे बच्चे खुदगर्ज
बन जाते है। सामाजिक जिम्मेदारिया जैसे की दुसरोको मदत करना , सरकार और सामजिक कामो में हाथ बाटना इत्यादि. समाजमे बेहतर इंसान बनानेके लिए यह बोहोत प्रभवी चीज है।
अपने माता-पिता की जिम्मेदारियाँ।
जी हाँ अपने माता पिता की जिमेदिरियाँ। आज की पीढ़ी बहोतसे कारणोंके कारण अपने माता-पिता को संभालती नहीं है। इसी कारण बहोतसे बुजुर्ग वृद्धाश्रम में रहते है। पर वे यह भूल जाते है की उनके बच्चे यह सब उनसे सिख रहे है। जो माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों के अच्छी परवरिश में गुजारते है और आजकी पीढ़ी यह सब भूल जाती है। इसी कारन बहोतसे बुजुर्ग परेशानी में जीते है।
निर्णय लेनेकी आज़ादी।
सभीको
सोच के निर्णय लेने की आज़ादीकी जरुरत है। हमारे बच्चे कोई मशीन या रोबॉट नहीं है। हमें बच्चोंको उनका लक्ष्य चुननेका और निर्णय लेनेका अवसर देना चाहिए। उनके सपने पुरे करनेके लिए जिन्दागी के हर मोड़ पे हमें उनकी मदत करनी चाइये।
इसी वजहसे माता-पिता इस समाजका महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो की खुदकी ख्वायिशो का त्याग करते है अपने बच्चों , समाज और माता-पिता के लिए. उनके व्यवहार का असर आजकी पीढ़ियों पड़ता है। वे हमारे समाजके मार्गदर्शक है। उनके
निर्णय बोहोत मायने रखते है भविष्य के लिये।
